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राज्यसभा सांसद अमरपाल मौर्य ने ग्राम संसद की स्थापना की मांग उठाई

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21/03/2025 8:21 PM Total Views: 29736

राज्यसभा सांसद अमरपाल मौर्य ने सदन में सभापति को संबोधित करते हुए ग्राम संसद की स्थापना की मांग उठाई। उन्होंने कहा कि भारत एक ग्रामीण प्रधान देश है, जहां 70% से अधिक आबादी गांवों में निवास करती है। ऐसे में गांवों के विकास और स्थानीय शासन को अधिक प्रभावी बनाने के लिए ग्राम संसद का गठन आवश्यक है।

ग्राम संसद से ग्रामीण सशक्तिकरण

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सांसद अमरपाल मौर्य ने प्रस्ताव रखा कि जिस तरह देश में लोकसभा और राज्यसभा के माध्यम से निर्णय लिए जाते हैं, उसी प्रकार गांवों में ग्राम संसद की स्थापना होनी चाहिए। इसमें ग्राम प्रधान, वार्ड सदस्य (बीडीसी) और अन्य पंचायत प्रतिनिधि शामिल हों, जो गांवों के विकास से जुड़े मुद्दों पर चर्चा करें और प्रस्ताव पारित करें।

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ग्राम संसद की प्रमुख विशेषताएँ

1. मासिक बैठकें: हर महीने 10 दिन ग्राम संसद का संचालन हो, जिसमें गांव के विकास संबंधी योजनाओं पर चर्चा की जाए।

2. डिजिटल रिकॉर्डिंग: सभी प्रस्तावों और निर्णयों का डिजिटल रिकॉर्ड रखा जाए, जिससे पारदर्शिता बनी रहे।

3. ग्राम संसद भवन: प्रत्येक ग्राम पंचायत में एक विशेष भवन की व्यवस्था हो, जिसमें कंप्यूटर, बैठने की उचित व्यवस्था और कार्यालय की सुविधा उपलब्ध हो।

4. सूचना केंद्र एवं पुस्तकालय: ग्राम स्तर पर एक पुस्तकालय और सूचना केंद्र की स्थापना हो, जहां सरकारी योजनाओं की जानकारी मिले और 24 घंटे विद्युत आपूर्ति उपलब्ध हो।

5. विकेंद्रीकरण एवं भागीदारी: ग्राम संसद के माध्यम से स्थानीय लोगों की निर्णय लेने में सीधी भागीदारी सुनिश्चित हो, जिससे योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन किया जा सके।

उत्तर प्रदेश में होगा बड़ा असर

सांसद अमरपाल मौर्य ने उत्तर प्रदेश का उदाहरण देते हुए बताया कि प्रदेश में 58,194 ग्राम पंचायतें, 7,32,563 वार्ड सदस्य और 77,788 क्षेत्र पंचायत सदस्य हैं। ग्राम संसद की स्थापना से अकेले उत्तर प्रदेश में 8 लाख से अधिक लोगों की निर्णय लेने में सीधी भागीदारी होगी, जिससे गांवों का विकास तेजी से हो सकेगा।

गांधी के ग्राम स्वराज का सपना होगा साकार

सांसद ने अपने वक्तव्य में महात्मा गांधी के ग्राम स्वराज की अवधारणा को भी दोहराया। उन्होंने कहा कि गांधी जी का सपना था कि गांव आत्मनिर्भर बनें, स्थानीय शासन को मजबूती मिले, निर्णय लेने में जनता की सीधी भागीदारी हो और हर व्यक्ति को समान अधिकार मिले।

73वें संविधान संशोधन का दिया हवाला

सांसद अमरपाल मौर्य ने पंचायती राज व्यवस्था को लेकर गठित विभिन्न समितियों का उल्लेख किया, जिनमें बलवंत राय मेहता समिति (1957), के. संथानम समिति (1963), अशोक मेहता समिति (1978), जी.वी.के. राव समिति (1985) और एल.एम. सिंघवी समिति (1986) शामिल हैं। उन्होंने कहा कि 73वें संविधान संशोधन के तहत पंचायती राज को संवैधानिक दर्जा दिया गया, लेकिन अब इसे और प्रभावी बनाने के लिए ग्राम संसद की स्थापना जरूरी है।

ग्राम संसद से होगा ग्रामीण विकास

सांसद ने कहा कि ग्राम संसद के गठन से गांवों में शासन व्यवस्था अधिक पारदर्शी और प्रभावी होगी। इससे न केवल विकास योजनाओं का बेहतर क्रियान्वयन होगा, बल्कि गांवों को आत्मनिर्भर और संगठित बनाने में भी मदद मिलेगी।

अमरपाल मौर्य की इस मांग को लेकर अब राजनीतिक और सामाजिक हलकों में चर्चा शुरू हो गई है। अगर यह प्रस्ताव मंजूर होता है, तो यह ग्रामीण भारत की राजनीति और विकास में एक ऐतिहासिक बदलाव साबित हो सकता है।

 

 


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