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लोक निर्माण विभाग में कूटरचित दस्तावेजों से पंजीकरण कराने वाले ठेकेदारों पर अब तक क्यों नहीं हुई एफआईआर?

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25/05/2025 10:15 AM Total Views: 38703

लखनऊ। उत्तर प्रदेश लोक निर्माण विभाग (PWD) में ठेकेदार शालिनी दीक्षित और आशीष दीक्षित के खिलाफ कूटरचित दस्तावेजों के माध्यम से फर्जी पंजीकरण कराने, महिला कर्मियों से अभद्रता और भ्रष्टाचार जैसे गंभीर आरोपों के बावजूद अब तक एफआईआर दर्ज न होना विभागीय कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।

सूत्रों के अनुसार, मा. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी को भेजी गई एक विस्तृत शिकायत में बताया गया कि श्री आशीष दीक्षित द्वारा फर्जी दस्तावेजों के आधार पर विभाग में ठेकेदार के रूप में पंजीकरण कराया गया था। शिकायत में लगाये गये आरोपों की पुष्टि होने के बाद पीडब्ल्यूडी मुख्यालय ने उनका पंजीकरण निरस्त कर दिया, परंतु आज तक उनके और उनकी पत्नी शालिनी दीक्षित के विरुद्ध कोई मुकदमा दर्ज नहीं किया गया।

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शिकायतकर्ता के अनुसार, पंजीकरण की तिथि से लेकर अब तक आशीष और शालिनी दीक्षित द्वारा किए गए समस्त निर्माण कार्यों का ब्योरा मण्डल के कार्यालयों से माँगा गया था, परन्तु उनकी ऊँची पहुँच और विभाग के सलाहकार वी.के. सिंह व अन्य वरिष्ठ अभियंताओं से सम्बन्धों के कारण फाइलें दबा दी गईं।

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गंभीर आरोपों की सूची में शामिल हैं:

  • विभागीय पंजीकरण हेतु कूटरचित दस्तावेज़ों का प्रयोग
  • महिला कर्मचारियों के साथ अभद्रता व तंज कसना
  • विभागीय कार्यों में बार-बार बाधा डालना

अधिकारियों पर दबाव बनाकर निरस्त पंजीकरण को पुनः बहाल कराने की साजिश

सेवानिवृत्त मुख्य अभियंता ने भी पुष्टि की है कि आशीष दीक्षित की सांठगांठ मिनिस्टीरियल एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष बीरेन्द्र कुमार यादव एवं पूर्व महामंत्री ओम प्रकाश पटेल से रही है। इन दोनों बाबुओं पर आरोप है कि ये क्लास-1 और क्लास-2 अभियंताओं के ट्रांसफर व सेवा लाभ के एवज में मोटी रकम की वसूली करते थे और लोक निर्माण विभाग के बजट आवंटन में भी सीधा हस्तक्षेप करते थे।

इन बाबुओं पर भी गंभीर आरोप:

1. अनुसूचित जाति की महिला पदाधिकारी कु. उषा के साथ दुष्कर्म और हत्या

2. आय से अधिक संपत्ति की जाँच सतर्कता विभाग द्वारा

सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इन गंभीर आरोपों के बावजूद न तो आशीष दीक्षित और शालिनी दीक्षित पर कोई आपराधिक कार्रवाई हुई और न ही बीरेन्द्र यादव व ओम प्रकाश पटेल जैसे प्रभावशाली बाबुओं को पूरी तरह मुख्यालय से हटाया गया, बल्कि इनका तबादला होने के बाद भी वे लखनऊ मुख्यालय पर सक्रिय बने हुए हैं।

अब सवाल उठता है:

  • क्या पीडब्ल्यूडी भ्रष्टाचार के दलदल में फंस चुका है?
  • क्या मुख्यमंत्री द्वारा घोषित “जीरो टॉलरेंस नीति” केवल कागजों तक सीमित है?
  • यदि कूटरचित दस्तावेज प्रमाणित हो चुके हैं, तो अब तक एफआईआर क्यों नहीं?

जनता और जवाबदेही की माँग:

शिकायतकर्ता ने मांग की है कि ठेकेदार शालिनी दीक्षित और आशीष दीक्षित के विरुद्ध तत्काल एफआईआर दर्ज की जाए, फर्जी निर्माण कार्यों की उच्चस्तरीय जाँच हो और विभागीय संरक्षण देने वाले अधिकारियों के खिलाफ भी कठोर कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।

 


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